नज़्म: "जिंदगी की गूंज"
ज़िंदगी की गूंज में खोया सा हूँ, तेरे बिना हर लम्हा अधूरा सा हूँ।
तेरी मोहब्बत की चादर में सना हुआ, हर ग़म को छुपा रहा, पर हाँ, थका हुआ।
शहर की गलियों में बिखरे हुए ख्वाब, तेरे बिना वो सब हैं जैसे सूखे पेड़ के पत्ते।
हर सुबह की चुप्प में तेरा ही नाम है, तेरे बिना ये हर दिन जैसे काले बादल की तरह।
रात की चाँदनी में खोया सा हूँ, तेरे बिना हर चाँदनी का रंग फीका सा हूँ।
सपनों की गलियों में तेरा ही रंग है, तेरे बिना ये दुनिया जैसे बिना रंग की हो।
ज़िंदगी की गूंज में खोया सा हूँ, तेरे बिना हर लम्हा अधूरा सा हूँ।