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ज़रूर! यहाँ एक नज़्म है जो मोहब्बत और समाज के जज़्बात को छूने की कोशिश करती है: "मोहब्बत की रहगुज़ार"

 मोहब्बत की रहगुज़ार

मोहब्बत की रहगुज़ार पर जब तेरे कदम पड़े, सफ़र की चुप्प में हर दर्द के लम्हे संजोये।

तेरे हुस्न की चाँदनी में दिल के जख्म सहेजे, हर हसरत को तेरे ही नाम से जोड़े।

कभी उस राह पर, जहां तेरा मेरा मिलन था, अब वहां सिर्फ ख़्वाबों की छाँव रह गई है।

तेरे बिना जैसे शामें बेवजह की हो गईं, तेरे इश्क़ की वो क़समें भी खुदा की हो गईं।

राह में जो कांटे थे, अब भी वही बिखरे हैं, तेरे बिना हर खुशी जैसे तन्हाई से मिल गई है।

मोहब्बत की रहगुज़ार पर, अब भी तेरे निशां हैं, तेरे बिना हर दिन जैसे बेमानी सा लगता है।

ख्वाबों की दुनिया में तेरे होने का अहसास, तू जो नहीं, तो दिल का हर कोना है वीरान सा।

अब इस सफर की राह पर, बस यादें रह गईं, तेरे बिना ये मोहब्बत की कहानियाँ अधूरी हैं।