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मोहब्बत और ज़िन्दगी

 इक दिन मोहब्बत ने ज़िन्दगी से कहा,

तू भी कितनी तन्हा और वीरान है,
तुझमें रौनक़ कहाँ, बस धुआं ही धुआं,
तू चलती तो है, पर थकी-थकी सी जान है।


ज़िन्दगी हंसी, और धीरे से बोली,
मोहब्बत, तेरी भी यही कहानी है,
तू खिलती है पल दो पल के लिए,
पर आख़िर में तुझमें भी वही वीरानी है।

तूने चाहा जिसे, वो मिल ना सका,
तूने पाया जिसे, वो समझ ना सका,
इश्क़ में उलझी रही, पर न सुकूं मिला,
आखिरकार तुझमें भी बस इक झूठी रवानी है।

मोहब्बत ने कहा, "तू क्यों यूं रो रही है,
मैं तो दिल का सफर, तू तो पूरी ज़िन्दगी है,
मेरी मंज़िलें चाहे अधूरी सही,
पर तेरे बिना मेरी हर चाहत अधूरी है।"

ज़िन्दगी मुस्कुराई, और बोली ये बात,
मोहब्बत से ही मेरी राहें हैं खास,
तूने सिखाया मुझे क्या है जीना,
वरना मैं भी बस एक चलते हुए रास्ते की तलाश।

आप इस नज़्म में मोहब्बत और ज़िन्दगी के जज़्बातों की बात को महसूस कर सकते हैं, जहाँ दोनों एक-दूसरे को समझने की कोशिश कर रहे हैं।